“पानीपत के युद्ध: इतिहास के महत्वपूर्ण पन्नों की कहानी”

पानीपत का प्रथम युद्ध (1526)

Panipat ka Yudh

सैन्य बल 

  • बाबर की सेना के पास उम्मीदनीय रूप से 15,000 सैनिक और लगभग 20 से 24 तोपें थीं। उनके खिलाफ इब्राहिम लोदी की सेना थी, जिसमें लगभग 30,000 से 40,000 सैनिक और कम-से-कम 1000 हाथी शामिल थे।

बाबर की रणनीति

  • अस्र-शस्र युद्ध की सफलता के पीछे केवल बल ही नहीं, बल्कि बाबर की तुलुगमा और अरबा की रणनीति ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तुलुगमा युद्ध नीति का मूल उद्देश्य सेना को विभिन्न इकाइयों में विभाजित करके उन्हें बाएं, दाएं, और मध्य में विभाजित करना था। इस प्रक्रिया में, बाएं और दाएं भाग को आगे बढ़ावा दिया गया और अन्य छोटी इकाइयों को पीछे के भाग में विभाजित किया गया। इसके परिणामस्वरूप, एक छोटी सेना का उपयोग दुश्मन को चारों ओर से घेरने के लिए किया जा सकता था।

    अरबा युद्ध नीति के तहत, केंद्रीय फ़ॉरवर्ड डिवीजन को बैलगाड़ियाँ (अरबा) के साथ प्राप्त होने वाली थीं, जो दुश्मन की मुख्य पंक्ति के साथ तैनात की जाती थीं। ये बैलगाड़ियाँ जानवरों की चमड़ी से बनी रस्सियों से बंधी होती थीं। अरबा के पीछे, तोपों को रखा जाता था, ताकि पीछे छिपकर दुश्मनों पर प्रहार किया जा सके।

    इस रूपरेखा के माध्यम से हम देखते हैं कि अस्र-शस्र युद्ध में न केवल बल, बल्कि भूमिका और युद्ध नीतियों के महत्वपूर्ण पहलू भी थे, जिन्होंने इस युद्ध को जीतने के लिए महत्वपूर्ण साधने प्रदान किए।

युद्ध का परिणाम

  • काबुलिस्तान के तिमुरीय शासक बाबर, जिन्होंने मुग़ल सेना के साथ जोड़कर, दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी की विशाल सेना को हराया। इस महत्वपूर्ण जीत ने बाबर को भारतीय मुग़ल साम्राज्य की नींव रखने में सफल बना दिया।

    इब्राहिम लोदी की मौके पर ही मृत्यु हो गई थी, युद्ध के मैदान में, और उनके सामंतों और सेनापतियों ने उन्हें वहीं छोड़ दिया। इन सिपाहियों ने बड़े भाग्यशाली रूप से दिल्ली के नए शासक के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया। इस रूप में, वे मुग़ल साम्राज्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए और बाबर के विजय का मार्ग प्रशस्त किया।


पानीपत का द्वितीय युद्ध (1556)

पानीपत का दूसरा युद्ध 5 नवंबर, 1556 को उत्तर भारत के हिंदू शासक सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य (लोकप्रिय नाम- हेमू ) और मुग़ल साम्राज्य के सम्राट अकबर की सेना के बीच पानीपत के मैदान में लड़ा गया था। इस महत्वपूर्ण संघर्ष में अकबर के सेनापति खान जमान और बैरम खान ने भी अद्वितीय भूमिका निभाई थी।

इस युद्ध के परिणामस्वरूप, दिल्ली पर वर्चस्व के लिए मुग़लों और अफग़ानों के बीच चले संघर्ष में अंतिम निर्णय मुग़लों के पक्ष में हो गया और अगले तीन सौ वर्षों तक सत्ता मुग़लों के पास ही रही। इस इतिहासकारी युद्ध ने भारतीय इतिहास की पन्नों पर एक महत्वपूर्ण प्रमुख घटना के रूप में जगह बनाई और हिंदू साम्राज्य की प्रागैतिहासिक स्थिति को प्रभावित किया।

पृष्ठभूमि

  • सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य, जिन्हें प्रिय भाषा में हेमू भी कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्ति थे। हेमू का जन्म वर्तमान हरियाणा के रेवाड़ी जिले में हुआ था। वे 1545 से 1553 तक शेरशाह सूरी के पुत्र इस्लाम शाह के सलाहकार भी रहे हैं।

    हेमू ने 1553 से 1556 के बीच इस्लाम शासन के महामात्य और इस्लाम शाह के सेनानायक के रूप में अपनी विशेष कुशलता दिखाई, और उन्होंने 22 युद्ध जीते। ये युद्ध सूरी शासन के विरुद्ध अफगान विद्रोहियों के विद्रोह को दबाने के लिए लड़े गए थे।

    1556 के 24 जनवरी को, मुगल शासक हुमायूँ का निधन दिल्ली में हुआ, और उनके पुत्र अकबर को उनके उत्तराधिकारी बनाया गया। इस समय, अकबर केवल 13 साल के थे।

    1556 के 14 फरवरी को, पंजाब के कलानौर में अकबर का राज्याभिषेक किया गया, जिससे मुगल शासन का एक नया युग आरंभ हुआ। राज्याभिषेक के समय, मुगल साम्राज्य का क्षेत्र काबुल, कंधार, दिल्ली और पंजाब के कुछ हिस्सों तक सीमित था।

    हेमू का योगदान भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण है, और उन्होंने अपनी महान कौशलता और योगदान के लिए याद किए जाते हैं।

युद्ध 

  • अकबर और उसके संरक्षक बैरम खान ने युद्ध क्षेत्र से 5 कोस (8 मील) दूर तैनात रहकर युद्ध में अक्रिय भूमिका निभाई। बैरम खान ने 13 वर्षीय राजा को व्यक्तिगत रूप से युद्ध के मैदान में उपस्थित नहीं होने दिया, बल्कि उसने उसे 5000 सैनिकों के साथ विशेष गार्ड के साथ सुरक्षित रखा और युद्ध के मैदान से थोड़ी दूरी पर तैनात किया।

    मुगल सेना के एक अग्रगामी दल में 10,000 घुड़सवार थे, जिनमें से 5000 अनुभवी सैनिक थे, तैयार होने के लिए हेमू की प्रमुख सेना के साथ लड़ने के लिए। हेमू ने अपनी सेना का स्वयं नेतृत्व किया और उसकी सेना 1500 हाथियों और उत्कृष्ट तोपखाने के साथ थी। हेमू के पास 30,000 सुप्रशिक्षित राजपूत और अफगान अश्वारोही सैनिक थे, जो उत्कृष्ट तरीके से सजे हुए थे और सेना के मानदंड को बढ़ावा देने में मदद कर रहे थे।

युद्ध का परिणाम

हेमू अपने सैन्य बल के साथ युद्ध की ओर अग्रसर हो रहे थे, लेकिन अकबर की सेना ने हेमू की आँख में तीर मारकर उसे घायल कर दिया, जिससे वह बेहोश हो गए, और इस घटना ने उसकी युद्ध में जीत की ओर बढ़ने की संभावना को कम कर दिया।

हेमू को हौदा (घोड़े की पीठ पर सवारी के लिए गद्दी) पर नहीं देखकर, हेमू की सेना में उत्साह और असमंजस का माहौल बन गया, जिससे वह युद्ध में हार गए।

युद्ध समाप्त होने के कई घंटे बाद, हेमू को मृत अवस्था में पाया गया, और उसे शाह कुली खान महरम (Shah Quli Khan Mahram) द्वारा पानीपत के शिविर में अकबर के डेरे पर लाया गया।

हेमू के समर्थकों ने उसके शिरश्छेदन (Beheading) स्थल पर एक स्मारक का निर्माण कराया, जो आज भी पानीपत के जींद रोड पर स्थित सौंधापुर (Saudhapur) गाँव में मौजूद है। इस स्मारक के माध्यम से हेमू के युद्धीय पराक्रम को याद किया जाता है।


पानीपत का तृतीय युद्ध (1761)

14 जनवरी, 1761 को, पानीपत में एक महत्वपूर्ण संघर्ष आया था, जिसे पानीपत का तीसरा युद्ध के रूप में जाना जाता है। इस युद्ध में दिल्ली से लगभग 60 मील (95.5 किमी) उत्तर में स्थित पानीपत के क्षेत्र में मराठा साम्राज्य और अफगानिस्तान के प्रमुख, अहमद शाह अब्दाली जिसे अहमद शाह दुर्रानी भी कहा जाता है, के बीच लड़ा गया।

इस महायुद्ध में, दोआब के रोहिला अफगान और अवध के नवाब शुजा-उद-दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया। इस संघर्ष के दौरान, वे एकत्र होकर बड़ी संख्या में युद्ध के लिए तैयार थे। इसमें विभिन्न राजनीतिक और सामरिक प्रासंगिकताएँ थीं, और यह भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण पल का हिस्सा बन गया।

यह युद्ध भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रबल संघर्ष का प्रतीक बन गया, जिसमें भारतीय शासकों और उनके सामंतों के बीच राजनीतिक खगोलशास्त्र और दक्षिण एशियाई सभ्यताओं के साथ संघर्ष का सामना करना पड़ा।

इस युद्ध के परिणामस्वरूप, अहमद शाह अबदाली की ओर से मिली विजय ने भारतीय इतिहास के नए चरण को चिह्नित किया और इसके परिणामस्वरूप भारतीय गणराज्यों के साथ उनके संबंधों में नई स्थितियों की शुरुआत हुई।

इस प्रसंग में, पानीपत का तीसरा युद्ध भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण घटना का प्रतीक है और इसका महत्व भारतीय संघर्ष के इतिहास में अद्वितीय है।

सैन्य बल

  • सैन्य दृष्टि से इस युद्ध को 18वीं सदी के युद्धों में सबसे बड़ा माना जाता है, जिसमें दो सेनाओं के बीच एक दिन में सबसे अधिक मौतें हुई थीं। इस युद्ध के समय सेना ने अफ़गान और रोहिलों की भारी घुड़सवार सेना और तोपखानों (ज़बुरक और जेज़ाइल) के साथ मुकाबला किया, जिसका नेतृत्व अहमद दुर्रानी और नजीब-उद-दौला ने किया। इस युद्ध में मराठों की फ्रांसीसी आपूर्ति वाली तोपखाने और घुड़सवार सेना को परास्त कर दिया गया।

पृष्ठभूमि

  • 27 वर्षीय मुगल-मराठा युद्ध (1680-1707) के परंतु, मुगल साम्राज्य के पतन के परिणामस्वरूप, मराठा साम्राज्य ने अविशेष गति से विस्तार किया। पेशवा बाजीराव ने गुजरात और मालवा क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। आखिरकार, 1737 के अंत में, बाजीराव ने दिल्ली के परिधियों में मुगलों को परास्त किया और मराठा साम्राज्य ने दक्षिणी पूर्वी मुगल प्रदेशों का अधिकांश अपने अधीन कर लिया। इससे अहमद शाह अब्दाली के दुर्रानी साम्राज्य के साथ मराठों के बीच सीधा संघर्ष हुआ।

    1759 में, उन्होंने पश्तून जातियों की एक सेना का गठन किया, जिससे पंजाब क्षेत्र में छोटे मराठा सरदारों के खिलाफ कार्रवाई करने में उन्हें लाभ हुआ। इसके बाद, उन्होंने अपने भारतीय सहयोगियों के साथ मिलकर मराठों के खिलाफ एक व्यापक गठबंधन में गांगेय दोआब के रोहिला अफगानों को शामिल किया।

    यहाँ तक कि आपके प्रशंसापूर्ण शब्दों का विनाश नहीं किया गया है और अर्थ भी बना है।

शुजा-उद-दौला की भूमिका

  • मराठों के साथ-साथ अफगानों ने भी अवध के नवाब शुजा-उद-दौला को अपने शिविर में शामिल करने की कोशिश की। इस प्रयास के दौरान, जुलाई के अंत तक, शुजा-उद-दौला ने अफगान-रोहिल्ला गठबंधन में शामिल होने का फैसला लिया, जो कि ‘इस्लाम की सेना’ के रूप में जाना जाता था।

    मराठाओं के लिए यह रणनीतिक रूप से एक बड़ा नुकसान था, क्योंकि शुजा-उद-दौला ने उत्तर भारत में अफगान सेना के लंबे समय तक प्रवास के लिये वित्त प्रदान किया था। इससे यह संदेह उत्पन्न हुआ कि क्या अफगान-रोहिल्ला गठबंधन के बाद शुजा-उद-दौला के समर्थन के बिना मराठा अपना संघर्ष जारी रख सकेंगे।

    इस इतिहासिक प्रसंग में, यह उल्लिखित किया जा सकता है कि मराठों और अफगानों के बीच के ये रणनीतिक खेल ने उनके गठबंधन की मजबूती को प्रभावित किया और उनके इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बन गए।

खाद्य आपूर्ति में बाधा 

  • अगस्त 1760 में, मराठा सेना ने अपना नजरिया दिल्ली की ओर बढ़ाया और शहर पर हमला किया। इसके बाद, उनके और यमुना नदी के किनारे के क्षेत्र में संघर्ष आया, जिसमें मराठों ने लगभग 15,000 अफगान सैनिकों को पराजित करके जीत हासिल की।

    इसके बाद, अब्दाली ने अक्तूबर में बागपत क्षेत्र में यमुना नदी को पार करके अपने सेना के लिए एक मुख्य आवास बनाया दिल्ली में। अंत में, पानीपत नगर में मराठों के खिलाफ अब्दाली के नेतृत्व में दो महीनों तक एक लंबा घेराबंदी आयोजित किया गया।

    इस घेराबंदी के दौरान, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की आपूर्ति राहों को बंद करने का प्रयास किया। इसमें अफगान सेना बहुत प्रभावी थी और वे नवंबर 1760 के आखिर में मराठा सेना के प्रायः सभी खाद्य आपूर्तियों को बंद कर दिया।

    मराठा सेना के शिविर में दिसंबर के अंत तक या जनवरी की शुरुआत तक भोजन की स्थिति बिगड़ गई और हजारों मवेशियों की मौके पर मौके पर मौके हो रही थी। जनवरी की शुरुआत में, भूखमरी से मरने वाले सैनिकों की खबरें आने लगी थीं।

युद्ध

  • मराठा सरदारों ने अपने सेनानायक सदाशिव राव भाऊ (Sadashiv Rao Bhau) से विनम्रता से अनुरोध किया कि उन्हें भूख से नहीं, बल्कि युद्ध में शौर्यपूर्वक बलिदान करने का अधिकार दिया जाए।

    इस महाकवि में यह लड़ाई कई दिनों तक चली, और इसमें लगभग 125,000 से अधिक सैनिकों ने भाग लिया। दोनों पक्षों के सैन्यों को नुकसान और लाभ का अहसास हुआ, और यह युद्ध बहुत लंबे समय तक जारी रहा।

    अहमद शाह दुर्रानी के नेतृत्व में सेना ने मराठों के कई पक्षों को पराजित करने के बाद जीत हासिल की।

    इस युद्ध में दोनों पक्षों की क्षति का अंशिक अंदाजा इस प्रकार है कि: युद्ध में 60,000 से 70,000 के बीच सैनिकों की जान गई, जबकि घायल और कैदियों की संख्या में काफी अंतर था। युद्ध के दूसरे दिन लगभग 40,000 मराठा कैदियों की जान ली गई।

युद्ध का परिणाम

  • युद्ध के परिणामस्वरूप, उत्तर में मराठा प्रगति को बढ़ावा देने और अपने क्षेत्रों की स्थिरता को लगभग 10 वर्षों तक बनाए रखने की मिशन के रूप में पानीपत के युद्ध के बाद यह प्राथमिक उद्देश्य था।

    10 वर्षों की इस अवधि को पेशवा माधवराव के शासन के तौर पर जाना जाता है, जिसे पानीपत के युद्ध के पराजय के बाद मराठा शक्ति के पुनरुत्थान का श्रेय दिया जाता है।

    पानीपत के तृतीय युद्ध के दस वर्षों बाद (वर्ष 1771) पेशवा माधवराव ने एक महत्वपूर्ण अभियान के अंतर्गत उत्तर भारत में एक बड़ी मराठा सेना को भेजा, जिसका उद्देश्य था:

    1. उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य को पुनः स्थापित करना।
    2. अफगानों के साथ या उनके समर्थन करने वाली विद्रोहकारी शक्तियों जैसे कि रोहिला और पानीपत के युद्ध के बाद मराठा साम्राज्य को दहला देने से रोकना।

    इस अभियान की सफलता को पानीपत के युद्ध की लम्बी कहानी की अंतिम चरण के रूप में देखा जा सकता है, जिसने मराठा साम्राज्य को पुनः सशक्त बनाया और उनकी प्रगति को नवीनतम ऊर्जा दी।

नोट:

  • पानीपत के तीनों युद्धों में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन युद्धों के कारण पानीपत शहर कभी भी नहीं बना। पानीपत हमेशा से दिल्ली का प्रवेश द्वार रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से, उत्तर-पश्चिम से आने वाले किसी भी आक्रमक को दिल्ली को कब्ज़ा करने के लिए खैबर दर्रे और फिर पंजाब के माध्यम से जाना पड़ा। इस बात को विस्तार से समझाने के लिए हमें इन घटनाओं के पीछे के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिपेक्ष्य को देखने की आवश्यकता है।

    पानीपत के प्रसिद्ध युद्धों में प्रथम युद्ध (1526 ई.) नेबू के शासक इब्राहीम लोदी और बाबर के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराया और मुघल साम्राज्य का नींव रखा।

    दूसरा पानीपत का युद्ध (1556 ई.) अकबर और हेम चंद्र विक्रमादित्य के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में अकबर ने मुघल साम्राज्य की मजबूती को और बढ़ाया और भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनाया।

    तीसरा पानीपत का युद्ध (1761 ई.) अफगान और मराठा सेनाओं के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में अफगानों ने जीत हासिल की और मराठा साम्राज्य की कमजोरी का पूर्णानिकारण किया।

    इन युद्धों का पानीपत के शहर से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन इन्होंने भारतीय इतिहास को बदल दिया और दिल्ली के खिलजी और लोदी शासकों के प्रति मुघल साम्राज्य की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान किया।

    इस तरीके से, पानीपत ने ब्रिटिश और फ्रेंच साम्राज्यों के बीच भी महत्वपूर्ण युद्धों के लिए स्थल के रूप में कार्य किया, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा दिया। इस प्रकार, पानीपत ने हमारे इतिहास के महत्वपूर्ण पृष्ठों की रूपरेखा को नकारात्मक रूप से प्रकट किया है, जो हमारे देश की विविधता और समृद्धि का प्रतीक है।

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