अलैंगिक जनन | Alangik Janan - UP

अलैंगिक जनन | Alangik Janan

प्रत्येक जीव केवल कुछ निश्चित समय तक हो जीवित रह सकता है। जीव के जन्म से उसकी प्राकृतिक मृत्यु तक का यह काल उस जीव को जीवन अवधि को निरूपित करता है।

चित्र 1.1 में कुछ जीवों की जीवन अवधि दिखाई गई है। बहुत से अन्य जीवों के चित्र प्रस्तुत किए गए हैं। इन चित्रों को देखकर इनके बारे में पता लगाकर दिए गए रिक्त स्थान में आपको उनको जीवन अवधि के बारे में लिखना है।

चित्र 1.1 में निरूपित जीव को जीवन अवधि का परीक्षण कीजिए। क्या यह दोनों बातें रोचक एवं कौतूहल पूर्ण नहीं है कि यह अवधि कम से कम एक दिन या फिर अधिक से अधिक कुछ हजार वर्ष हो NCER सकती है?

इन दोनों चरम सीमाओं के मध्य अधिकांश जीवित जीवों की जोवन अवधि बनी रहती है। आप शायद इस बात पर ध्यान देंगे कि किसी जीव को जीवन अवधि का आवश्यक रूप से आकार (साइज) से संबंध नहीं है;

कौआ और तोता के आकार में कोई अंतर नहीं होता, फिर भी इन दोनों के जीवन अवधि में बहुत अंतर होता है। ठीक इसी प्रकार से आम के वृक्ष की जीवन अवधि पीपल के वृक्ष तुलना में बहुत कम होती है।

जीवन अवधि भले ही कितनी हो हो. परंतु प्रत्येक जीव को मृत्यु सुनिश्चित है। दूसरे शब्दों में यह कह सकते कि एक कोशीय जीव को कोई भी जब अमर नहीं है। हम क्यों कहते हैं कि एक कोशीय जीव की प्राकृतिक मृत्यु नहीं होती?

इस वास्तविकता को जानते हुए क्या आपको आश्चर्य नहीं होता कि हज़ारों वर्षो से पृथ्वी पर पादपों तथा पशु पक्षियों की विभिन्न स्पेशीन की विशाल संख्यामान है? जीवित में कुछ प्रक्रियाएँ अवश्य ही ऐसी है जिनसे यह निरंतरता सुनिश्चित होती है। यहाँ हम जानका उल्लेख कर रहे हैं जिसे हम निश्चित मानते है।

जीवों में जनन को यहाँ एक जीव विज्ञानीय प्रक्रम के रूप में परिभाषित किया गया है; जिसमें एक जीव अपने समान एक छोटे से जीव (संतति) को जन्म देता है। संतति में वृद्धि होती है, उनमें परिपक्वता आती है तथा इसके बाद वह नयी संतति को जन्म देती है। इस प्रकार जन्म वृद्धि तथा मृत्यु चक्र चलता रहता है। जनन प्रजाति में एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी में निरंतरता बनाए रखती है। आप बाद में अध्याय 5 (आनुवंशिकता और विविधता के सिद्धांत) में अध्ययन करेंगे कि किस प्रकार आनुवंशिक विविधता जनन के दौरान सृजित या वंशागत होती हैं।

जीव विज्ञानीय संसार में व्यापक विविधता पाई जाती है तथा प्रत्येक जीव अपने को बहुगुणित करने तथा संतति उत्पन्न करने के लिए अपनी ही विधि विकसित करता है। जीव किस प्रकार से जनन करता है उसके वास, उसकी आंतरिक शरीर क्रिया विज्ञान तथा अन्य कई कारक सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। जनन प्रक्रिया दो प्रकार की होती है जो एक अथवा दो जीवों के बीच भागीदारी पर आधारित रहती है। जब संतति की उत्पत्ति एकल जनक द्वारा युग्मक (गैमोट) निर्माण की भागीदारी के साथ अथवा इसकी अनुपस्थिति में हो तो वह जनन अलैंगिक कहलाता है। जब दो जनक (विपरीत लिंग वाले) जनन प्रक्रिया में भाग लेते तथा नर और मादा युग्मक (गैमीट) में युग्मन होता है तो यह लैंगिक जनन कहलाता है।

1.1 अलैंगिक जनन

इस विधि में एकल जीव (जनन) संतति उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। इसके परिणामस्वरूप जो संतति उत्पन्न होती है वह केवल एक दूसरे के समरूप ही नहीं, बल्कि अपने जनक के एकदम समान होती है। क्या यह संतति आनुवंशिक रूप से भी एक समान अथवा भिन्न होती है? अकारिकीय तथा आनुवंशिक रूप से एक समान जीवों के लिए क्लोन शब्द की रचना की गई है।

आइए। जीवों के विभिन्न वर्गों के मध्य पाए जाने वाले अलैंगिक जनन के विस्तृत रूप का अध्ययन करें। अलैंगिक जनन सामान्य रूप से एकल जीव, पादप तथा जीव (अपेक्षाकृत साधारण जीव) आदि में पाया जाता है। प्रजीव तथा एक केंद्रकीय जीव(प्रोटिस्टा एवं मोनेरा) में जनक कोशिका दो में विभक्त होकर नए जीवों को जन्म देती हैं (चित्र 1.2)। अतः इन जीवों में कोशिका विभाजन एक प्रकार से जनन की क्रिया विधि है। बहुत से एकल- कोशिका जीव द्विखंडन से उत्पन्न होते हैं, जिनमें एक कोशिकादो भागों में विभक्त हो जाती है और प्रत्येक भाग एक वयस्क जीव के रूप में तीव्रता पूर्वक वृद्धि कर जाता है (जैसे अमीबा, पैरामीसियम आदि)। यीस्ट में यह विभाजन एक समान नहीं होता तथा छोटी कलिकाएँ उत्पन्न हो जाती हैं जो प्रारम्भ में तो जनक कोशिका से जुड़ी रहती हैं और बाद में अलग हो कर नए यीस्ट जीव में परिपक्व हो जाती हैं।

फंजाई जगत के सदस्य तथा साधारण पादप जैसे शैवाल विशेष अलैंगिक जननीय संरचनाओं द्वारा जनन करते हैं (चित्र 1.3)। इन संरचनाओं में अत्यंत ही सामान्य संरचनाएँ अलैंगिक चलबीजाणु (जू स्पोर्स) हैं जो सामान्यतः सूक्ष्मदर्शीय चलनशील संरचनाएँ होती हैं। अन्य सामान्य अलैंगिक जनन संरचनाएँ कोनिडिया (पैनीसिलम), कलिका (हाइड्रा)) तथा जैम्यूल (स्पंज) होते हैं।

कक्षा 11 में आपने पादपों के कायिक जनन के बारे में अवश्य ज्ञान प्राप्त किया होगा। आपका क्या विचार है कि कायिक जनन भी एक प्रकार का अलैंगिक जनन है? आप ऐसा क्यों सोचते है? क्या क्लोन शब्द कायिक जनन से उत्पन्न संतति के लिए उपयोज्य है।

जबकि जंतुओं तथा अन्य साधारण जीवों में अलैंगिक शब्द का प्रयोग स्पष्ट रूप से तथा पादपों में इस शब्द का प्रयोग निरंतर किया जाता है। पादपों में कायिक प्रवर्धन की इकाई जैसे उपरिभूस्तारी (सर) प्रकन्द (सरजोम) सकरकन्द बल्व, भूस्तरी (ऑफ सेंट) सभी नयी संतति को पैदा करने का सामर्थ्य रखते हैं (चित्र 1.4)। ये संरचनाएँ कायिक प्रवर्ध (प्रोपेग्यूल) कहलाती है. चूँकि इन संरचनाओं के निर्माण में दो जनक भाग नहीं लेते, अतः यह अलैंगिक जनन ही होगा।

आपने निश्चित तौर पर जलाशयों की ‘महाविपत्ति’ (वाटर हायासिंथ) अथवा ‘बंगाल के आतंक’ के बारे में अवश्य सुना होगा। यह कुछ भी नहीं, बल्कि जलीय पादप वाटर हायसिंथ है जो ठहरे जल में सर्वाधिक वृद्धि करने वाला खरपतवार है। यह जल से ऑक्सीजन खींच लेता है जिसके परिणामस्वरूप मछलियां मर जाती है। आप इसके बारे में और अधिक अध्याय 13 और 14 में पढ़ेंगे। आपको जानकर रोचक लग सकता है कि इस पादप का भारतवर्ष में आगमन मात्र इसमें सुंदर आकार के पुष्प तथा पत्तियों के कारण हुआ यद्यपि यह कायिक प्रवर्धन द्रुतगति से कर सकता है और अल्प समय में ही संपूर्ण जलाशय पर फैल जाता है और अपने आप से जलाशय को ढक देता है और इससे छुटकारा पाना बहुत ही कठिन होता है।

क्या आप इस तथ्य से परिचित है कि आलू, गन्ना, केला, अदरक, डहेलिया जैसे पादपों की खेती किस प्रकार की जाती है? क्या आपने आलू के कंद पर स्थित कलिका (जिसे आँख भी कहते हैं) से और केले तथा अदरक के प्रकंद से नन्हा सा पादप निकलता हुआ देखा है? जब आप ध्यान पूर्वक उपर्युक्त सूचीबद्ध पादपों में से विकसित होने वाले पादपको (प्लाटलेट्स) की उत्पत्ति स्थानों का निर्धारण करने का प्रयत्न करेंगे तब आप पाएँगे कि यह अधिकतर इन पादपों के रूपांतरित स्तंभों में उपस्थित प्रर्वसंधियों (नोड्स) से उत्पन्न होती है. जब यह पर्वसंधियाँ नमीयुक्त मृदा अथवा जल के संपर्क में आती है तब इनके मूल (रूट्स) तथा नए पादप उत्पन्न होते हैं। ठीक इसी प्रकार पत्थरचटा (बायोफिलम) की पत्तियों में कटे किनारों से अपस्थानिक (एडवेंटिसियस) कलिकाएँ उत्पन्न होती है। माली लोग तथा किसान पादपों के इस गुण सामर्थ्य का पूरा लाभ उठाते हुए ऐसे पादपों का बड़े पैमाने पर प्रवर्धन करते हैं।

ध्यान देने योग्य एक रोचक बात यह है कि अपेक्षाकृत साधारण जीवों में अलैंगिक जनन ही जनन की सामान्य विधि है; जैसे कि शैवाल तथा फंजाई और ये प्रतिकूल परिस्थितियों के आरंभन से पूर्व जनन को लैंगिक विधि की ओर बढ़ने लगती है। यह पता करें कि किस प्रकार लैंगिक जनन प्रतिकूल परिस्थितियों में इन जीवों को जीवित रहने में सहायता करता है? लैंगिक जनन ऐसी परिस्थितियों में सफलतापूर्वक क्यों संपन्न होता है? उच्च श्रेणी के पादपों में दोनों विधियों अलैंगिक (कायिक) तथा लैंगिक द्वारा जनन देखा गया है। NCE दूसरी ओर, अधिकांश जतुओं में जनन को केवल लैंगिक विधि ही होती है।

 

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